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संस्कृत शोध संस्थान
श्री मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति

11, रवींद्रनाथ टैगोर मार्ग, इंदौर- (म.प्र)
फोनः 0731- 2516657
फैक्सः 0731-2529511
ई मेल:info@sanskritshodh.org
 
 

 

 

 

 

 

   
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संस्कृत शोध संस्थान बनेगा विश्वभाषा के समग्र अध्ययन का केन्द्र -विनायक पांडेय

28 जून 2008 को देश की महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने समिति परिसर में संस्कृत शोध संस्थान का शिलान्यास किया । इस संस्थान की भविष्य की योजना एवं इसकी संपूर्ण संकल्पना को इस आलेख में समिति के शोधमंत्री डॉ. विनायक पांडेय ने लिपिबद्ध किया है ।

हर युग की अपनी कुछ विशेषताएँ, जो युगधर्म का रूप ग्रहण कर लोगों के आचार और विचार में समाहित हो जाती हैं । लोग उस युगधर्म के समान आचरण करते हैं तथा उनका चिंतन भी उसी के अनुरूप होता है ।

जब दुनिया में मनुष्य को अपने अस्तित्व का बोध हुआ तभी उसे उसके साथ संस्कार शब्द भी जुड़ गया और उस संस्कार के साथ ही उसको संस्कारित कराने वाली भाषा संस्कृत भी । इसका उपहास करते हुए जिन विदेशी विद्वानों ने अपने युगधर्म का परिचय देते हुए इस भाषा को कभी 'गडरियों का गीत' कहा था वही उनके ज्ञान-विज्ञान की भी जननी बनी और उन्हें सभ्य समाज के बीच लाकर खड़ा कर दिया । उसी की छत्र छाया में पल बढ़कर वे ज्ञानी और विज्ञानी कहलाये ।

हमारे ऋषियों और महर्षियों की अनुपम सौगात का लाभ उठाकर सरकड़े की बैलगाड़ी से रॉकेट और उपग्रहों के निर्माण तक की यात्रा उन्होंने निर्बाध गति से पूर्ण कर ली । जिस कम्प्यूटर यंत्र के माध्यम से उन्होंने संचार क्रांति का उद्घोष किया वह भी संस्कारित और वैज्ञानिक भाषा संस्कृत को अपने से अलग नहीं कर पाया; परिणामस्वरूप आज संम्पूर्ण विश्व संस्कृत भाषा के आगे नतमस्तक है ।

संस्कृत भाषा भारतीयों की प्राणभूता भाषा है । इसमें ही उनका समस्त सारभूत चिंतन, गवेषणा और अनुभूतियाँ समन्वित है । भारत वर्ष का समस्त प्राचीन ज्ञान भंडार संस्कृत में ही निहित है अतः यह भारतीय संस्कृति की रीढ़ है । इस भाषा में निहित समस्त वैदिक वाङ्मय, धर्मग्रंथ, पुराण, रामायण, महाभारत, स्मृति ग्रंथ, दर्शन धर्मशास्त्र, महाकाव्य, काव्य, नाटक, गद्यकाव्य, व्याकरण, गणित, नीतिशास्त्र, भाषाशास्त्र, ज्योतिष, कर्मकांड, वास्तुकला, अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, कामशास्त्र, नक्षत्र विद्या, आयुर्वेद, धनुर्वेद, इतिहास, नृत्यकला, अभिनय कला, पिंगलशास्त्र, भूगोल, संगीत, कोशग्रंथ आदि विद्याएँ, प्राचीन ऋषियों, कवियों विश्लेषकों, तत्त्वज्ञों एवं वैज्ञानिकों के अथक परिश्रम से संप्राप्त नवनीत है, जिसका प्राशन न केवल भारतवर्ष अपितु संपूर्ण विश्व ने समान रूप से किया है । इस तथ्य की संपुष्टि मेकडानल, विंटरनित्स, मैक्समूलर, एडलबर्ट, कुहन आदि पाश्चाचात्य चिंतकों के विचारों से होती है ।

संस्कृत भाषा में रचित विपुल साहित्य के साथ ही इसकी आनुषंगिक भाषाओं- पालि, प्राकृत और अपभ्रंश इत्यादि में निहित प्रचुर साहित्य भी उतना ही समादरणीय माना जाता है, जितना कि संस्कृत भाषा में उपनिबद्ध, वाङ्मय । इतना ही नहीं संस्कृत भाषा समस्त भारतीय भाषाओं की जननी होने के कारण उनमें सन्निहित रचनाओं एवं साहित्य की मूलाधार भी है ।

इस भाषा में निहित विशाल साहित्य ने मनुष्य को पुरुषार्थी बनाया है । दुनिया आज जिसे सत्य मानकर चल रही है और अंततः पतन के गर्त में शनैः शनैः प्रवेश करती जा रही यह तथाकथित पुरुषार्थ की कसौटी नहीं अपितु काल के गाल में समाने का उपक्रम मात्र है । भारतीय मनीषा ने विश्व को धर्मशास्त्र दिया - सुखी और समृद्ध समाज में अनुशासन स्थापित करने के लिए अर्थशास्त्र प्रदान किया - आवश्यकताओं की प्रतिपूर्ति हेतु साधन एकत्रित करने के लिए । कामशास्त्र दिया - जीवन को आह्रदित और स्वस्थ बनाने के लिए तथा मोक्षशास्त्र प्रदान किया - जीवन के चरम उद्देश्य के लिए । इनके साथ ही वेद विज्ञान, नीति, वास्तु विद्या, नक्षत्र विद्या, आयुर्वेद, धनुर्वेद, विमानन विद्या, नृत्यकला, अभिनय कला से आज तक अविच्छित्र रूप से सारे देश करते आ रहे हैं ।

आज हमारा देश स्वतंत्र है । हमारा गौरवपू्र्ण अतीत बताता है कि हमने अपनी प्राचीन विधाओं और उनकी आधार भाषा संस्कृत के बल पर विश्वगुरु पद पर अधिष्ठित रहते हुए पूरी दुनिया का मार्गदर्शन किया है । इसमें हमारी दो पुरातन परम्पराएँ कारण रही हैः- प्रथम तो वैयक्तिक विचार स्वतत्रंता और दूसरी प्रयोगों और अनुसंधान कार्यों के प्रति हमारी प्रवृत्ति इन्हीं दो को साथ लेकर हमने यूनान, मिश्र, अमेरिका, जर्मनी, जापान, चीन, जावा, सुमात्रा, सीरिया, फ्रांस और अरब आदि देशों के साथ ज्ञान विज्ञान का सदा आदान-प्रदान किया है । सबके सहयोग से वास्तु विद्या, आयुर्वेद, ज्योतिष, रसायन शास्त्र, पदार्थ विज्ञान तथा कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में परस्पर पर्याप्त अभिवृद्धि की ।

आज भी असंख्य ऐसे क्षेत्र हमारे सामने विद्यमान हैं, जो अपने अध्येताओं की बाट जोह रहे हैं । वर्तमान परिस्थितियों में हमारे सामने वह अवसर उपस्थित हो चुका है, जब हम युगधर्म की चकाचौंध से ग्रस्त समाज की आँखों में अपने सनातन सत्य, न्याय धर्म, संस्कार और समानता की औषधियों से निर्मित अंजन का प्रयोग कर उसे अज्ञान के अंधकार से मुक्त करें । शोध की नव-नवीन धाराओं के ऊत्स अंदर ही अंदर छटपटाहट महसूस कर रहे हैं, अपने को धारा में परिणित कर ज्ञान-विज्ञान के महासमुद्र में एकाकार होने के लिए । ऐसी तमाम संभावनाओं को उद्भाषित करने का उपक्रम है - संस्कृत शोध केन्द्र की स्थापना । इसकी प्रतिष्ठा तब और भी प्रासंगिक और महत्वपूर्ण बन जाती है जब यह संस्कृत और संस्कृति की आराधिका माता अहिल्या की नगरी इन्दौर स्थित श्री म.भा. हिन्दी साहित्य समिति की ऐतिहासिक भूमि से जुड़ जाती है । जिन माता अहिल्या के राज्य में वेदशालाओं और संस्कृत पाठशालाओं में राज्यसत्ता के मूल अधिकार सुरक्षित थे तथा राज्याधिकार की डोर जहाँ से संचालित होती थी उसी राज्य की नैतिक परंपरा की पद्धति में पले बढे़ और स्वाभिमान से दीप्त एक युवक पं. श्रीनिवास चतुर्वेदी ने अंग्रजों की अर्सेबली में संस्कृत विद्या की प्रतिष्ठापना का उद्घोष बड़ी दबंगता से किया था । संस्कृत पाठशाला का यह स्नातक समिति का एक अविभाज्य अंग भी था । आज उसकी स्मृति शेष है लेकिन उनकी यशःकाया अपने स्वप्न को साकार होते देख रही है और इसी के साथ यह बापू की भी तो वरद भूमि रही है । निश्चित रूप से संस्कृत भाषा की प्रातिभिक सत्ता का शिलान्यस महामहिम के हाथों होना एक और ऐतिहासिक और गौरवपूर्ण क्षण है ।

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